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Monday, 7 April 2014

छिप रही हो तुम

हाँ मैं जानता हूँ 
कि डिम्पल जो लुक्का-छिप्पी खेल रहा है 
वो खेलना तुम भी  जानती हो 

ऐसा नहीं है की तुमको ये नहीं पता है 
फ़र्क सिर्फ इतना है 
की वो अपने छुट्टी के समय पर 
बड़ों से पूछ कर 
दोस्तों को जुटा कर 
और अपने मन से 
खेल रहा है

तुम्हारा खेल कुछ और हीं है

तुम तो न दोस्तों को जुटाती हो 
न हीं किसी से पूछती हो 
और क्यूंकि छुट्टी तुम्हारे पास रहता है बहुत 

छिप जाती हो  कहीं 
बाहर आती हीं नहीं

ऐसी शाम के साये में 
जहाँ धूप और छांह का पता न चले 
उस चंद की तरह चुप जाना  
तुम्हारी फ़ितरत बन गयी है 





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आसमां को छूने के लिए

उन लंबे हाथों से तुमने
अपने बालों को छुआ था 

और मुझे लगा 
की तुम आसमां को छूने के लिए 

हाथ बढ़ा रही हो

Sunday, 6 April 2014

पहुँचता हूँ जब तेरे क़दमों पे

वो जो नूर देखा है

तेरी छवि में मैंने


गिरता हूँ रोज़ दिन

तेरे क़दमों पे

सरकता सरकता 
पहुँचता हूँ जब तेरे क़दमों पे 
तेरे उन पिछले आहटों की खनक 
मेरे सीने में गूँज उठती है

तुम ही थी, मेरे साथ 
सदियों से

हाथ पकड़, मैं तुम्हारे सहारे ही खड़ा रहा
आज तुम्हे छोड़ रहा हूँ

तेरी आहट को बनाने वाले 
उस पायल ने 
मुझे बुलाया है

फिर बांध लेना मुझे पैरों मे

और तुम्हारे संगीत से
शयद कोइ और भी गिरे तेरे पैरों में
सरकता सरकता 
पहुंचे तेरे क़दमों तक
और फिर वही पिछले 
आहटों की खनक ...

क्या तुम्हारा भी स्वाद ऐसा हीं है ?

खत्म सब शराब की बोतलें और कभी ना खत्म होने वाले रास्ते खत्म
नशे में तुम क्या और नहीं चल सकते थे
गोल गोल
माना की वो चाँद 
जो सितारों से अभी भी बात कर रहा है कभी भी छुप जाएगा
लेकिन क्या तुम्हे भी छुपना जरूरी था
क्या तुम और नहीं चल सकते थे
और वो स्वालीन की पुडिया जो तुम चाव से खा रहे थे ना जाने क्यूँ मुझे तुम्हारे चेहरे की याद दिला रहा है
छुप गया तुम्हारा चेहरा सड़कों पे लगी बत्तियों के बीच के अंधेरों में और उन अंधेरों के बीच में जो चाय हमने ली थी
क्या तुम्हारा भी स्वाद ऐसा हीं है ?

मेरे-तेरे बीच उसे मत बांधो

कैसे समझाऊँ उसे
कि वो जो नूर है
मेरी-तेरी आँखों में नहीं

वो तो बस है
मेरे-तेरे बीच
हम लोगों को छोड़कर

हम ज़रूरी नहीं उसके होने के लिए

वो है
वो था
वो रहेगा

उसका होना
खुद का नूर है

मेरे-तेरे बीच उसे मत बांधो

रहने दो उसे
रंग चढ़ने दो उसपे

फिर फूल खिलेंगे
और कांटे भी

और अपनी एक दुनिया होगी
चाँद सितारों वाली

फिर हम हीं खुदा होंगे


वो जो ख्वाब है ख़ुशी का

वो जो ख्वाब है ख़ुशी का
मुझ में हीं छुपा मिलता है

जैसे कोई परत चढ़ी हो
और आहिस्ता-आहिस्ता
उनके पीछे जाकर 
मैं खुद को पा लेता हूँ

उन पर्दों के पीछे जाकर
जब मैं तुम्हे सोचता हूँ
तुम्हे महसूस करने लगता हूँ

वो जो आइना है मेरी खिड़की के पास
उसमें साफ़-साफ़ तुम्हे देख पता हूँ

चलना कभी :
हम उस खिड़की से दुनिया कि सैर करेंगे


Tuesday, 25 March 2014

वो जो मेरे जनाज़े में आये थे

वो जो मेरे जनाज़े में आये थे
सब के सब, बेहोश आये थे

थी तो उनमें जिंदगी की चाहत
उन्हें क्या पता था, किसि की मौत में आये थे

लेकिन बेहोश
किसे रहता है होश

मेरे कफ़न को मेरा तोहफा समझ ले गए
मुझे नंगा छोड़ गए

(Urdu can be a bit wrong.)

وو جو میرے جنازے میں اے تھے
سب کے سب بیہوش اے تھے

تھی تو انمیں زندگی کی چاہت
انھ کیا پتا تھا، کسی کی موت میں اے تھے

لیکن بیہوش
کسی رہتا ہے ہوش

میرے کفن کو میرا تحفہ سمجھ لے گئے
مجھے ننگا کھود گئے

Monday, 30 December 2013

रंग रंगाई

रंग में रंग रहा हूँ तेरे
धीरे धीरे
रंग में रंग रहा हूँ तेरे
धीरे धीरे  

कोइ हाथ पकड़ के
रास्ता दिखने वाला है जो
शायद रंग रंगा देगा वो
धीरे धीरे

पूछुंगा उससे तेरा रास्ता
रंगों की खुशबु देग वो मुझे
धीरे धीरे 


फिर वापस नहीं आना है
फिर तर जाना है
रंग में रंग जाना है
धीरे धीरे 


धीरे धीरे

Monday, 2 December 2013

रिश्ते तो अब नहीं

रिश्ते तो अब नहीं
यादें हैं बस

उन्हीं के सहारे
तुमसे नफरत करने से
खुद को बचा पाता हूं

दूरी हमारे बीच शायद कभी नहीं मिटेगी
मगर तुम्हें धन्यवाद देता रहूंगा

मुझे अपना धर्म बहुत प्यारा है

Friday, 30 March 2012

आज आँख बोझिल है, और सूरत दिल में चुभ रही है

आज आँख बोझिल है, और सूरत दिल में चुभ रही है
सपने गर्त में, और आशा कहीं छुप रही है

ताज़ा हैं ज़ख्म, हाथ मल रही है
आंसू साँसों के साथ मिल, सिसकियाँ ले रही है

कहा था मैंने, समय अब थम जाएगा
घढ़ी भी धीरे-धीरे, चल रही है

जब निकला था घर से हौसला ले के
मालूम न था की आंधी चल रही है

देखे थे जो सपने, धूल में मिल रही है
ताकत थक रही है, सिमट रही है

उन चमकीले तारों कि तरह, रात में निकलने वाले न हो जाना 'शशि'
माना कि रौशनी घट रही है |





Thursday, 29 March 2012

कहना जो है कहूँगा ज़रूर, शब्द अभी ताज़ा है


कहना जो है कहूँगा ज़रूर, शब्द अभी ताज़ा है
जिंदगी है लंबी, वक्त कम है न जादा है

समंदर से सीपियों को लाने में 'शशि'
हौसला है, तमन्ना है, हिम्मत है

कर दिखाऊंगा लोगों को
सूरज अभी निकलना कहाँ है

वक्त की आंधी चलेगी मेरे ओर
मैंने भी अपना पंख खुला रखा है

तमन्ना की पंखुड़ी पे बादल मंडराएंगे बून्दों की तरह
पत्तों की चिकनाहट को मैंने संजो रखा है

आगाज़ हुई है आज नए दिन की
जीने के लिये हीं मैंने आज तक खुद को बचा रखा है





Wednesday, 28 March 2012

कहने के लिये तो बहुत है लेकिन, ज़बान पर कुछ आता नहीं

कहने के लिये तो बहुत है लेकिन, ज़बान पर कुछ  आता नहीं
जब  दिन खुलेगी तो, चिड़ियों की चहचाहट सब बोल देगी

बरसों से उम्मीद लगाये बैठा था की वो आयेंगे
पता न था की सिर्फ  एक  दिन सारा राज़  खोल  देगी

हम  थे ना-काफी उनको बुलाने के लिये
इस  दिन ने इशारा किया और वो आ गयीं

अब धूप  निकली है तो मंज़र अलग है
आब-ओ-हवा सारे रास्ते खोल गयी











सपनों को पकड़ने की कवायद


नील पर  टंगे खजाने और नीचे भागती दुनिया
साँसों की गर्मी और जिस्म की ठंडक 
जैसे बचा लेगी उस लम्हे को 
तेज़ क़दमों से 















लपक लेगी और हाथ में पकड़ 
जैसे कभी न जाने देगी 

घूर के देखेगी 
और साँसों में कैद कर 
इस मकड जाल में खुद एक पांव रख देगी 

ऐसी हीं है यह 

वरना कोई कब लम्हों को पकड़ पाया है 

अँधेरे शाम में बैठे उस मेज़ पर जब भी कोई आँखें नीचे करके 
सोचने की कोशिश करता है आगे की 
शाम ढक लेती है उसे 
और दबे पांव 
उसके जिस्म में समां कर 
आँखों के सामने कुहासा भर देती है 

चुनौती है समय की 
सोचो तो एक बार सही 
और पल भर में सारे जहान की तस्वीरें 
किसी काली रात में कोई रूह की तरह 
आगे पीछे, ऊपर नीचे 
घूमने लगेंगी 

मेज़ पर बैठा 
सोच का पुतला 
समय के रेत में बह जाएगा 

स्याह रात में जो नील पर रौशनी है 
बुलाती है; न्योता है उनका 
पल भर को सारी तमन्ना भूल जाने के लिये 

सर जब उठा के देखोगे 
सपने, सच में बदले 
छोटे-छोटे चिंगारियों में तब्दील 
आँखों को मटोलेंगे 






Tuesday, 27 March 2012

उड़ते-उड़ते

उड़ते उड़ते
देखे ऐसे सपने
सच को टक्कर देते
मतवाले ऐसे |

जहाँ में और भी बहुत देखे थे ऐसे सपने,
मगर यकीन ना था कि ये इक हो जायेंगे ऐसे अपने |

रेत की तरह चिपक रही थी चेहरे पे आके
उड़ते -उड़ते , टकरा रही थी महलों के किनारे
मीनारों की गोल गुम्बदों के चारो ओर घूम रही ऐसे
मानो की अब गिरेगी या तब, ज़मीन पे आके |

पूछा जब मैंने की कहाँ  हो जा रही हो,
अपनी  खुश्की में किसको समेट रही हो,
और ज़ोर से चलने लगी हवा
उड़ते-उड़ते, कहने लगी हवा:

आज का दिन , सपनों का दिन है
आज दिन, दिन नहीं, एक सपना है
उड़ना चाहती हूँ इस रेत के साथ
फिजाओं  में, आसमां में;

पंख लगे हैं मेरे आज
तितलियों सी चाल है मेरी आज
मत रोको, मत पूछो
घूमने दो मुझे आज

और फिर वही रेत जा टकराई,
उस ऊँचाई  से जिसकी मुझे हमेशा से तलाश थी
और उसके चेहरे पे चिपक गयी
मानो की अब गिरेगी या तब |





Thursday, 25 August 2011

राही की आँखों में ...

हँसता  दिखता  हूँ, 
उस शीशे के सामने |                                                                                        

ग़म किसी घर कि दीवार पे,
झड़ते  हुए रंग कि तरह, 

और खुशियाँ : 

पंखे की खाली कील,
पर टंगी 

दिखती हैं |

न जाने क्यों ?

कोई घर
रास नहीं आता, 
न हीं कोई भी झड़ता हुआ 
रंग |

तमन्नायें :

धूल लगी किताबों में कैद
किसी कहानी में  
आंधी सी 

राही कि आँख में ...

Tuesday, 19 July 2011

जब थिरके पांव ज़मीन पे

उस ओर  चली वो,
इस ओर  आई वो,
पूरी  फिजा में,                                                                                               
छा सी गयी वो |

पांव में घूंगरू,
और हाथों में इशारे :

आँखों से हीं सब समझा गयी वो |

न जाने क्यों लोग ?
तालियाँ  बजाने लगते हैं :
जब लहरें; रुला जाती हैं उनको |

कायल न था,
इन तालों का,
इस भाषा का,

मगर  आज :
समय और सांस बाँध कर :

जिंदगी दिखला गयी वो |

Wednesday, 13 July 2011

अमीरों की बस्ती में गरीबों का डेरा


अमीरों  की बस्ती में गरीबों का डेरा ;
न हस्ती,  न मस्ती , कि
कुछ भी मेरा  |                                                                                                

महरूम हुए जाते हैं यहाँ ,
ख्वाबों के लिए भी !

अरे !

ज़रा देखो तो नालिओं को :                                  
आखिर इनमें पानी आते कहाँ से ?

Wednesday, 25 May 2011

सच्ची कहानी

 

इस कलम के जादू को
कोई किसी से ना छीने |
ख़ुद की कहानिओं को खत्म करने का ज़िम्मा ,
कोई दूसरा,
 अपने हाथों न ले |
छोड़ दी उसने तीन घंटे कि कहानी,                                                    
अब, एक साल और,
फिर से जी पाने के :
सपने संजोयेगा |

तीन घंटे में,
करो या मरो की दुनिया ,


कोई कहानी  हीं लगती है |









Sunday, 8 May 2011

ज़ुबान

पक्की सड़कों के किनारे,
बने पत्थर के फुटपाथ,
सजे दिखते  हैं, ऊँचे- ऊँचे,
शीशे के घरों के सामने |

शीशे में दिखती है,                                                                                 
पेड़ों से सजी आँगन,
जहाँ  उनकी शाखें, 
सरहदों को पार कर , पत्तों से: 
उस पत्थर को धूप से बचाती है |

ज़ुबान है पत्थरों और पत्तों के बीच |

मैं तो खुद से भी बात नहीं कर पाता  !



Friday, 6 May 2011

आरज़ू है बस, इक निगाह

शाम की आहटों में सुनी है तेरी आवाज़,
शाखों और पत्तियों में देखी है तेरी निगाह |                                                    

रोज़ बगल से जब गुज़रता :
था तो दरिया भी ,
और किसी साहिल की तरह भी ,
छू लेती थी तेरी पनाह |

मर्ज़ी तेरी थी नहीं मालूम,
फिर भी सर झुकाया;

आज फिर खड़ा हूँ सामने , 
आरज़ू है बस:

इक निगाह |